फागुणु उबाच
पहाड़ों की रानी मसूरी को बाहरी बिल्डरों की वक्रदृष्टि पड़ गई है। मसूरी के प्रवेश द्वार से लेकर कैंपटी और बुरांसखंडा-धनोल्टी तक अवैघ निर्माण और कंक्रीट के जंगल उगने से पहाड़ कराहा रहे है। लगातार पेड़ों के कटान और पहाड़ के सीने पर चल रही जेसीबी के पंजे ने यहां के पारिस्थितिकीय संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया है। और यही वजह है कि इस साल जनवरी का दूसरा सप्ताह भी बिना बारिश और बर्फवारी के गुजर गया। पहाड़ के साथ दानवी बिल्डर बलात कर रहे हैं। इसके सीने को छलनी कर रहे है। बीस किलोमीटर दूर बैठी धाकड़ सरकार की नजर गढ़ी-डाकरा से भी इन नंगे होते पहाड़ पर नही पड़ रही है। जबकि दिल्ली, मुम्बई,गुजरात,हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के भू-माफियाओं की वक्रदृष्टि से चप्पे-चप्पे और हर ढालदार जगह को खुर्द-बुर्द किया जा रहा है। कलम के कुंद होने से कुल्हाड़ी की धार तेज होना लाजिमी है। सत्तासीनों के रहमोकर्म पर अंग्रेजों का बसाया यह शहर कुछ दिन बाद हरे पेड़ देखने के लिए तरस जाएगा। पेड़ बचाने वालों की सांठ-गांठ से ही पेड़ों़ की बलि दी जा रही है। हर दिन कथित दोयम दर्जे के मीडिया में खबर आती है कि हाथीपांव के जंगलों में आरी चल गई। बात यहां पर भी नही ठहरती। वन विभाग के अधिकारियों को कोई सूचना देता है तो एक दर्जन पेड़ की जगह कुछ ही पेड़ों को काटा मानकर चालान अथवा जुर्माना देकर मामला रफा-दफा किया जा रहा है। पता तो हाकिम को भी है। लेकिन मजबूरी यह है कि पैसे का जुगाड़ तो इन्हीं बिल्डरों से होना है। पहले तो मसूरी के एक पर्यावरणविद् यहां की हरियाली को आत्म सात कर कुछ हल्ला करते थे। लेकिन अब सिस्टम के आगे न लड़ पाने की गुंजाईश के चलते वे भी 20 किलोमीटर दूर नींबूवाला में घाम ताप रहे हैं। आका ने योजना ही ऐसी बनाई। पेड़ नही होंगे तो घाम की तपिश सर्दियों में तेज होगी। मसूरी वाले भी कुछ साल बाद तो घाम ही तापेंगे। बची-खुची हरियाली की बलि कुछ सालों में चढ़ ही जाएगी। सूबे के एक कथित पर्यावरणविद् जो सिर को लाल किए रहते हैं एक बार भी देहरादून और मसूरी में हरे पे़ड़ों पर चल रही आरी के लिए नही बोले, मौन साधे दूसरे पुरस्कार के लिए बड़े दरबार में दंडवत खड़े है। एक अबला बेटी की हत्या के मामले को उलझा रहे है। उनका अब जल जंगल जमीन से क्या लेना-देना।
ताजुब्ब तो यह है कि मसूरी में 70 से लेकर 90 डिग्री ढाल पर भी बिल्डर पिलिंथ तैयार कर मानचित्र स्वीकृत करवा रहे है। इनको आसानी से इतने ढ़ाल पर प्राधिकरण कैसे स्वीकृति दे रहा है। दूसरा नोटिफाइड इस्टेट में धड़ल्ले से निर्माण कार्य हो रहे है। वन विभाग संज्ञान क्यों नही लेता और लेता भी है तो रस्म अदायगी कर चल देता है। यही आलम एमडीडीए का है, पहले अवैध निर्माण होने देता है और यदि किसी ने आवाज उठा भी दी तो चालान बोलकर चुप्पी साध लेता है। धन्नासेठों का काम नही रूकता अलबत्ता गरीब मंगसीरू के लिए सारे कायदे-कानून लाद दिए जाते है। जार्ज एवरेस्ट में पिछले साल से राजस ऐरो स्पोर्टस हेलीकाप्टर की उड़ान भरवाकर यहां के वन्यजीव विहार में विचरण करने वाले भोले-भाले जानवर और पक्षियों के ठोर को नुकसान पहुंचा रहा है। वहां पर्यटन को बढ़ावा देने वाले माननीय चुप। आचार्य के साथ हाथ मिलाकर, मलाई खा रहे है। देहरादून में बड़ी सरकार खामोष। नोटिफाइड इस्टेट में पिलिंथ का खेल भी इन दिनों चर्चा में है। रजिस्ट्री में पुराना खंडहर दिखाने का खेल तो ढाई दषक पुराना है। यह खेल प्राधिकरण के एक उम्दा इंजीनियर लोगों को बताकर चले गए थे। अब नए इंजीनियरों की तो पौ-बारह है। फिलहाल फागुणु गांव में नागराजा की जात देखने जा रहा है। हो सकता है तब तक विभागों की नींद खुल जाए और सत्ता में बैठे धाकड की कुर्सी सलामत रही तो कुछ उम्मीद जरूर है। वरना तब तक कन्हैया की बंषी की धुन सुनने भगवान नागराजा के दरबार में हाजिरी लगते है। इति
