बसाघाट में जंगल गायब, भवन हाज़िर: नोटिस जारी, पर कार्रवाई जॉइंट सर्वे में अटकी
*बसाघाट में ‘जंगल से महल’ तक का खेल: विभागों की नींद, भू-माफियाओं के हौसले बुलंद
मसूरी
पहाड़ों की रानी मसूरी में अवैध निर्माण अब कोई नई कहानी नहीं रह गई है। हालात ऐसे हैं कि अधिकांश जगहों पर संबंधित विभाग मानो आंखें मूंदे बैठे हैं, और जहां कहीं विभाग थोड़ा सक्रिय होकर कार्रवाई करता भी है, वहां मामला आकर एसडीएम कार्यालय द्वारा प्रस्तावित “जॉइंट सर्वे” की फाइलों में अटक जाता है। यह जॉइंट सर्वे कई-कई महीनों तक लंबित रहता है जिसमे कुछ खास प्रकार से निजी भूमि क़ो डीनोटिफ़ाइडसे बहार निकाल दिया हैं ऐसे प्रश्न कई लगने स्वाभाविक हैं. इस दौरान मौके पर निर्माण कार्य धड़ल्ले से जारी रहता है। नतीजा यह कि लगातार नोटिस और चालान के बावजूद अवैध निर्माण करने वालों के हौसले और भी बुलंद होते जा रहे हैं।
ऐसा ही एक मामला इन दिनों बसागत क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। चाहे इसे काट माकांजे रोड कह लें या फिर स्थानीय लोगों की भाषा में “माइनिंग वाली रोड”, यहां जो हुआ है वह कई विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार इस क्षेत्र में एक नोटिफाइड जंगल के बड़े हिस्से को पूरी तरह काट दिया गया और उसी स्थान पर देखते ही देखते एक विशाल भवन खड़ा कर दिया गया। जब इस पूरे प्रकरण की पड़ताल की गई तो सामने आया कि निर्माण के दौरान कई विभागों के नियमों की खुलकर अनदेखी की गई।
मामले की जानकारी मिलने के बाद प्रशासनिक महकमे में थोड़ी हलचल जरूर दिखी। बताया जा रहा है कि माइनिंग विभाग, वन विभाग और एमडीडीए ने अपनी-अपनी ओर से नोटिस जारी किए और आगे की कार्रवाई की तैयारी भी शुरू कर दी। यहां तक कि सीलिंग की प्रक्रिया की भी चर्चा होने लगी। लेकिन इसके बाद कहानी वही पुरानी राह पर लौट आई—मामला अब “जॉइंट सर्वे” के इंतजार में अटक गया है।
उधर जमीनी हकीकत यह है कि जहां कागजों में कार्रवाई की तैयारी चल रही है, वहीं मौके पर निर्माण गतिविधियां पहले की तरह आराम से जारी बताई जा रही हैं। प्रशासन की शुरुआती सख्ती के बाद अब फिर से **बहानों का दौर शुरू हो गया है, और कार्रवाई की रफ्तार मानो ठंडे बस्ते की ओर बढ़ती दिख रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सभी विभागों को पूरे मामले के तथ्य मालूम हैं, नोटिस जारी हो चुके हैं और अनियमितताओं की जानकारी भी सामने आ चुकी है, तब क्या प्रशासन सच में सख्त कदम उठाएगा? या फिर यह मामला भी मसूरी के कई अन्य मामलों की तरह फाइलों और सर्वे की प्रतीक्षा में धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
फिलहाल बसागत क्षेत्र में खड़ा यह विशाल निर्माण प्रशासनिक तंत्र को खुली चुनौती देता नजर आ रहा है।

